बातें करें मगर किससे

तारीख २६ अगस्त २००८ स्थल हिंदमहासागर मे अंतरराष्ट्री जल क्षेत्र में लंगर डाले अमेरिकी विमान वाहक पोत यूएस एस अब्राहम लिन्कन ; मुख्य मेजबान अमेरिका के सभी सेना ओं के सर्वोच्च सेनापति एडमिरल मुलेन ; दूसरे मेजबानों मे अफगानिस्तान मे अमेरिकी सेनाओ के कमांडर एरिक आल्सन , अमेरिकी सेन्ट्रल कमांड के कमांडर डेविड पैटरसन और दूसरे एक दर्जन से अधिक अमेरिकी उच्च सेनाध्यक्ष ; मेहमान के तौर पर इन्तजार हो रहा था पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष ; जनरल परवेज कयानी का | उद्देश्य , पाकिस्तान के जिहादी संगठनो के खिलाफ पाकिस्तानी सेना को युध्द के लिये प्रेरित करना | पाकिस्तान मे यदि परिणाम चाहिये तो एक ही तरीका है | सेना को प्रभाव मे लाना |

          प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह ने कुछ दिनो पहले एक बार कहा था की पाकिस्तान मे किससे बात करे इसका ही पता नही चलता | उपरोक्त घटना बतलाती है कि पाकिस्तान मे हम किससे और कैसे बातचीत करें |

          पाकिस्तान अपने अस्तित्व के ६३ वर्षो मे से लगभग ५६ वर्ष , प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सैनिक शासन मे रहा | इससे से ३८ वर्ष सेना ने प्रत्यक्ष शाशन किया ( अयूब १९५८ – ६९  , याहिया १९६४ – ७१, जियाउलहक १९७७ – ८८ एवं मुशर्रफ १९९९ – २००८ ) शेष वर्षो मे हालांकि नागरिक प्रशासन रहा है , परंतु सभी महत्वपूर्ण मामलो मे , विशेषकर , भारत और अफगानिस्तान के संबंधो के मामले  मे ,असली निर्णायक सेना ही है | ऐसे मे भारत – पाक संबंधो मे सुधार  के लिए हमे पाक सेना की मानसिकता , उसके लक्ष्य और उसकी महत्वाकांक्षाओं को समझना पड़ेगा |                                                                                                                                                                                         पाकिस्तानी सेना का स्वप्न भारत मे दुबारा इस्लामिक शासन लाना है | वे इस बात को नही भूल पाते की संख्या मे १५ प्रतिशत से कम होने पर भी , भारत मे लगभग ८०० वर्ष मुस्लिम शासन रहा है |  विविधताओ से भरा हुआ यह देश उन्हे अस्थिर लगता है | उनका विश्वास है कि देर सबेर भारत का विघटन होगा | त्वरित रूप से भारत की सामरिक क्षमता को कम करना उसका मुख्य लक्ष्य है |

          चूँकि पाकिस्तान मे विदेशनीति, विशेषकर भारत – पाक एवं पाक – अफगान संबंधो के बारे में नीति , सेना तय करती है , परिणाम स्वरूप नीति विशेषरूप से सामरिक दृष्टि कोण से बनाई जाती है | भारत के साथ व्यापारिक संबंध, जो वास्तवमे पाकिस्तान के ही फायदे में है , का विरोध, आतंकवाद को बढ़ावा , जो आगे चलकर पाकिस्तान के लिये ही विनाशकारी साबित हुआ , इसी दृष्टिकोण का परिणाम है |                                      

        पाकिस्तान की सेना , अपने को इस्लामिक विचारधारा का रक्षक मानती है | इस्लामिक विचारधारा और धार्मिक विचारधाराओं से काफी अलग है | इसमे सर्वधर्म समभाव जैसे विचार की कोई गुंजाइश नहीं है , केवल इस्लाम का रास्ता ही सही रास्ता है | पाकिस्तानी सेना , चूकि अपने को इस विचारधारा की प्रमुख रक्षक मानती है , अत: ऐसे मे उसकी मन: स्थिति किसी प्रकार के सहयोग , सदभाव को स्वीकार करने की नही रहती |        

        पाकिस्तान मे वहां के संसद , राष्ट्रपति , मंत्रिमंडल या नागरिक प्रशासन किसी का भी पाकिस्तानी सेना पर प्रभाव या नियंत्रण नही है | सेना पाकिस्तान मे एक सार्वभौमिक सत्ता है | वह अपने कार्यक्रम एवं लक्ष्य स्वयं तय कराती है | पाकिस्तानी सेना के लक्ष्यों मे भारत के साथ अच्छे संबंध नहीं है |

पाकिस्तान – चीन के संबंध भारत के साथ निकट संबंधो के रास्ते मे एक दूसरा बड़ा रोड़ा है | पाकिस्तानी शासक , पाकिस्तान के जन्म के समय से ही भारत के साथ सैनिक एवं आर्थिक असंतुलन को नकारने के लिये , किसी बड़े देश के साथ गठजोड़ का सहारा लेते रहे है |  पहले अमेरिका का सहारा लिया गया और अब जब अमेरिका विश्व मे अपना प्रभुत्व खो रहा है , पाकिस्तान चीन से गठजोड़ कर भारत के साथ सैनिक एवं आर्थिक खाई को पाटने का प्रयत्न कर रहा है | चीन एशिया मे अपना एक छत्र प्रभुत्व चाहता है , और इसमे उसे भारत अकेला प्रतिद्वन्दी के तौर पर दिखाई देता है | चीन कभी नहीं चाहेगा कि भारत और पाकिस्तान एक दूसरे के बहुत नजदीक आयें और पाकिस्तान उसके प्रभावक्षेत्र से निकलकर भारत के प्रभावक्षेत्र मे जाये | पाकिस्तान को भी कभी , यदि भारत और चीन के बीच चुनाव करना हो तो वह चीन के साथ ही जायेगा |

        जबतक सामरिक उदेश्यों को केन्द्र मे रखकर पाकिस्तान की विदेशनीति बनती रहेगी तब तक भारत पाकिस्तान के बीच दूरगामी शांति एवं शांति एवं सौहार्द का होना बहुत मुश्किल है | पाकिस्तान मे सेना , पाकिस्तानी नागरिक प्रशासन , और पाकिस्तानी जनता तीनो के बीच एक खाई है | सामरिक विषयो पर, और काफी हद तक विदेशनीति पर, पाकिस्तानी सेना का वर्चस्व है | नागरिक प्रशासन , इन दोनो क्षेत्रो मे अपनी पकड़ खो चुका है | पाक सेना का ऐसा मानना है की वह नागरिक प्रशासन को समझती हैं परंतु नागरिक प्रशाशन सेना की कार्य प्रणाली के बारे मे कुछ नहीं जानता | पाक सेना के लिए नागरिक प्रशासन ब्लडी सिविलियन इन्काम्पीटेन्ट या स्टुपिड ( या दोनो ) हैं |

        आज पाकिस्तान अफगानिस्तान मे दुबारा पैर ज़माने के लिये बुरी तरह उतावला है | इसीके लिये पाक सेना को लश्करे – तौयबा , गुलबहादुर और सिराज्जुदीन हक्कानी के संगठनो के खिलाफ , अमेरिका के लाख दबावों के बावजूद , कोई कदम उठाने से इन्कार है | रणनीति , हक्कानी और गुलबहादुर  के संगठनो को , उनके लड़ाकों  सहित काबुल मे पुन:स्थापित करने की है | पिछले दो तीन महीनों से पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल परबेज कयानी और आइ एस आइ के प्रमुख जनरल पाशा दर्जनो बार काबुल का चक्कर इस नीति को कार्यान्वित  करने के सिलसिले में लगा चुके हैं  | इस महत्वपूर्ण नीति को कार्यान्वित करने में विदेश मंत्री कुरेशी – विदेश सचिव बासित या यहां तक की प्रधानमंत्री गिलानी या राष्ट्रपति जरदारी की भी जरूरत नही समझी  जाती | ये लोग सिर्फ भारत को बातो मे उलझाये रखने के काम आते है |

           भारत  पाकिस्तान के बीच शांति एवं सौहार्द लाने के लिये यह जरुरी है की सेना प्रशासन के आधीन हो | राजनैतिक दलो का पाकिस्तान मे संप्रभुत्व कायम हो | जबतक ऐसा नही होता , हमें भी अमेरिका की तरह पाक सेना के साथ सीधे संपर्क बनाना पड़ेगा | किसी भी अमेरिकी राजनीतीज्ञ या अधिकारी का मुख्य कार्यक्षेत्र इस्लामाबाद नहीं , रावलपिन्डी , पाकिस्तानी सैना का मुख्यालय होता है | एडमिरल मुलेन , अमेरिका की सेनाओं के सर्वोच्च सेनापति , जिनका जिक्र  शुरू मे ही आ चुका है , अभी अगस्त मे दो साल के भीतर पाकिस्तान मे उनकी उन्नीसवीं यात्रा थी | इसी तरह अमेरिकी विदेश सचिव श्रीमती हिलैरी क्लिन्टन प्रधानमंत्री गिलानी के साथ १५ मिनिट बात कराती हैं | जब कि  जनरल कयानी के साथ उनकी मीटिंग तीन घंटे चलती है |

            अफगानिस्तान मे तालिबान  का बढ़ता हुआ प्रभाव , एवं तालिबान से पाकिस्तान को बढ़ता हुआ खतरा एक नई संभावना को जन्म देता है | पाकिस्तान के दैनिक डान मे श्री सुनील शरन का एक लेख छपा है ( डान २० जनवरी २०१० ) जिसमे अफगानिस्तान को नियंत्रण मे लाने के लिये भारतीय सेना और पाकिस्तानी सेना के बीच के सहयोग का सुझाव दिया गया है | वास्तव मे अफगानिस्तान मे तालिबान की वापसी भारत और पाकिस्तान दोनो के हित मे नही है | जिहादी संगठनो का लक्ष्य आज , अमेरिकी सेना के वापसी से नही , पाकिस्तान और अफगानिस्तान पर पूर्ण नियंत्रण से पूरा होता है | भारत के लिये यह बहुत बडी खतरे की धंटी है | यदि पाकिस्तान जिहादी नियंत्रण मे जाता है , तो भारतीय सेना के लिये जिहादियों का तोड़ बेहद मुश्किल  होगा | पाकिस्तान के बाद दक्षिण एशिया पर नियंत्रण उनका मुख्य एजेंडा बन जायेगा | पाकिस्तान जिहादी आत्मघाती दस्तो के लिये भारत पर आत्मघाती हमला एक बेहद आकर्षक लक्ष्य होगा | जिहादियो के लिये यह जन्नत का सीधा और सबसे सस्ता टिकट बन जायेगा | 

            अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान के ये  जिहादी संगठन , भारत और पाकिस्तान दोनो सेनाओ के लिये सबसे बड़ा खतरा हैं | साझा  खतरे का सामना करने के लिये साझा सुरक्षा व्यवस्था भी जरुरी है | भारत और पाकिस्तान के बीच शायद सबसे अधिक दूरी उनकी सेनाओ के बीच है | हमे इस दूरी को कम करने का प्रयत्न करना होगा | वास्तव मे पाकिस्तानी सेना ने पहले भी इस प्रकार के संकेत दिये है की वे सीधे संपर्क को तरजीह देंगें | परंतु भारत मे विदेशनीति पर भारतीय सेना का प्रभाव न के बराबर है और भारतीय विदेश मंत्रालय और राजनीतिज्ञ सीधे पाकिस्तानी सेना से संबंध बनाने के अभ्यस्त नही है | पाकिस्तान से हमारी सारी बातचीत उनके विदेश विभाग के द्वारा ही होती है , भले ही वह पूरी तरह प्रभावहीन क्यो न हो |

 संयुक्त राष्ट्र संघ के अधीन जिहादी संगठनो के खिलाफ भारतीय और पाकिस्तानी सेना का संयुक्त अभियान शायद अफगानिस्तान और फिर दक्षिण एशिया को स्थिर करने मे सबसे प्रभावकारी कदम सिद्ध हो | इनके लिये जरुरी है कि पाकिस्तानी सेना के साथ सीधे संपर्क बनाया जाये , और भारत पाक सेनाओ के बीच , दूरी कम की जाये | इसके लिये हमे अमेरिकी कूटनीतिक व्यवहार की ओर  देखना चाहिये | हम पायेंगे की पाकिस्तान में विचारविमर्श के लिये ज्यादातर अमेरिकी जनरल भेजे जाते हैं , विदेश विभाग के अधिकारी नही | पाकिस्तानी सेना को हमे उनकी शंकाओं से , जो ज्यादातर  बलोचिस्तान एवं नार्दन एलाएंस के साथ कथित संबंधो को लेकर हैं , आश्वस्त करना होगा | दक्षिण एशिया और शायद पूरे विश्व में शांति के लिये यह सबसे बड़ा कदम होगा |

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