पाइपलाइनिस्तान जिहाद और भारत

पाकिस्तान मे जिहादी खात्मे के लिये जरुरी है कि १५००० मदरसे , जिसमे २० लाख जिहादी तैयार किये जा रहे हैं , बंद किये जायें | लश्करे तोयबा , जैशे मोहम्मद और सिपाही ए साहबा जैसे संगठनो की लगाम कसी जाये | परंतु पाकिस्तान ऐसा करेगा नही , भारत के कुछ बस मे नही और अमेरिका को पड़ी नहीं | जैसे ही कोई आंतकवादी संगठन पेन्टागन के साथ सहयोग करने लगता है , वह जागरूक नागरिक संगठन बन जाता है | अमेरिकी हस्तक्षेप का विरोध उसे सीधे ‘’तालिबान ‘’ की श्रेणी मे ले जाता है |  

                  फाटा , फ्रन्टियर और स्वात घाटी की कबाइली जनता चक्की दो पाटों के बीच पिस रही है | एक पाटा तालिबान का है दूसरा अमेरिका द्वारा प्रेरित , बल्कि कहिये धकियाई , पाकिस्तानी सेना का | अमेरिका की नीति पाकिस्तानी सेना को सहारा देने के साथ साथ जमीन्दारी और यथा स्थिति को भी बनाने रखने की है | सामाजिक विषमता के बावजूद |

                  अमेरिका की निगाह आज , लेसर की तरह , बलोचिस्तान पर चिपक गई है | तालिबान का केन्द्रीय नेतृत्व का बलोचिस्तान मे ही होना उस निगाह को और पैना बना देता है | पाकिस्तान विचारा क्या करे | बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से खाय | अपनी करनी का फल तो सबको भुगतना ही पड़ता है | बलोच विद्रोह आज उसके काबू मे नही है | तालिबान को बलोचिस्तान और फाटा मे जगह पाकिस्तान ने ख़ुशी खुशी दी | अब अमेरिका की पैनी निगाह से बचने के लिये उसे मुल्ला बदर और दूसरे शीर्ष तालिबान नेताओं को गिरफ्तार करना पड़ रहा है | अगर अमेरिका की निगाह इसी तरह चिपकी रही तो शायद ओसामा बिन लादेन और मुल्ला उमर की भी बलि चढ़ानी पड़े | 

                  लेसर की तरह निगाह बलोचिस्तान पर चिपके रहने का कारण , तालिबान नही , ग्वादर का बंदरगाह और बलोचिस्तान मे विश्व की संभावित सबसे बड़ी तांबा और सोने के अयस्क की खाने हैं |

                   भारत के लिये  गैस का सबसे सस्ता और सीधा श्रोत ईरान का विशाल पार्स का गैस क्षेत्र है , जो लम्बे समय तक भारत की उर्जा की जरूरतों को पूरा कर सकता है | गैस यदि पाकिस्तान से सहयोग मिले तो बलोचिस्तान होकर जमीनी पाइपलाइन से और यदि पाकिस्तान को , बलोचिस्तान की अस्थिरता को देखते हुये भारत सुरक्षित रहना चाहे , तो फारस की खाड़ी से जामनगर या हजीरा तक समुद्री पाइपलाइन द्वारा लाया जा सकता है | परंतु अमेरिका को यह बेहद नागवार गुजरेगा | अमेरिका की कोशिश है कि तापी पाइपलाइन द्वारा ,जिसका ठेका अमेरिकन तेल कंपनी शेवरान को मिल चूका है , तुर्कमानिस्तान की गैस ग्वादर या कराची के बन्दरगाह तक लाई जाये जहां से हजीरा तक समुद्री पाइपलाइन द्वारा इसे जोड़ा जा सकता है | दूसरी शाखा कंधार से पाइपलाइन को मुलतान होते हुये फजिल्का (पंजाब , भारत ) तक लाई जाये | परंतु जब तक कंधार मे तालिबान का बोलबाला है , कौन अपना पैसा ऐसी परियोजना मे लगायेगा |     

             भारत ने पहले जब ईरान पाकिस्तान पाइपलाइन मे शामिल होने की हामी भरी तो अमेरिका ने नागरिक परमाणु समझौते का चारा डाला | (वामपंथियो के परमाणु समझोते के विरोध का एक कारण उनका ईरान प्रेम भी था) अब जब दुबारा भारत गैस के लिये ईरान की और देख रहा है , अभी फरवरी के महीने मे तेल और प्राकृतिक गैस अयोग के अध्यक्ष श्री आर एस शर्मा ने नेशनल ईरान आयल के कंपनी के अध्यक्ष से लम्बी मुलाकात की , अमेरिका भारत को लुभाने के लिये कौन सा चारा डालता है , देखना है | 

             अमेरिका को शरियत से कोई परहेज नही यदि ग्वादर बंदरगाह का इपी (ईरान ,पाकिस्तान ,इन्डिया ) पाइपलाइन को ठंडे बस्ते मे डाल कर , तापी (तुर्कमानिस्तान , अफगानिस्तान , पाकिस्तान , इन्डिया ) के लिए वह भी अमेरिकी नियंत्रण मे , इस्तेमाल किया जाये |

             तापी पाइपलाइन के लिये , एशियन विकास बैंक ने २००३ मे ब्रिटिश संस्था पेप्सेन से एक प्राथमिक रिपोर्ट भी बनवाई थी | पाइपलाइन की वितीय स्थिति जानने के लिये | पेप्सने यह रिपोर्ट २००४ मे पूरीकर बैंक को पेश करदी | दौलताबाद – हेरात – कंदहार होते हुये मुल्तान तक की १६०० किलोमीटर लम्बी ३२ लाख घनमीटर प्रतिदिन क्षमतावाली इस पाइपलाइन का अनुमानित लागत २००४ मे ३३० करोड डालर ( करीब १४ ००० करोड रुपये ) आंका गया | बाद मे २००८ मे इस पाइपलाइन की क्षमता बढाकर १० करोड घनमीटर प्रितिदिन बनाकर फजिल्का (भारत) तक गैस लाने का प्रस्ताव बना इसमे से भारत को ६ करोड घनमीटर गैस देने का प्रस्ताव था | अनुमानित लागत २००८ मे लगभग ७६० करोड डालर (३२००० करोड रूपये ) आंकी गई |  

             परंतु भारत की आंख ईरान के पार्स गैस क्षेत्र से हटती नही हैं | भारत की महत्वकांक्षी योजना पाकिस्तान को परियोजना से अलग कर , ईरान मे चाहबहार पर केन्द्रित है | चाहबहार मे भारत ईरान के साथ मिलकर बंदरगाह बना रहा है | चाहबहार से रेल , पाइपलाइन और सडक परिवहन द्वारा अफगानिस्तान , मध्य एशिया एवं , रूस तक के बाजार मे जगह बनाई जा सकती है |                                                                                     

         इस प्रकार इपी और तापी ये दोनो कागजी पाइपलाइने दो भिन्न भौगोलिक राजनैतिक समीकरणों की जन्मदाता हो सकती हैं | एक अमेरिका द्वारा नियंत्रित भौगोलिक सामरिक क्षेत्र , जिसकी संभावना अफगानिस्तान , पाकिस्तान मे तालिबान के नियंत्रण पर निर्भर करेगी | दूसरा अमेरिका – इजरायल धुरी के लिये दु:स्वप्न समान , ईरान और भारत के निकटतम आपसी संबधों और क्षेत्रीय सहयोग पर निर्भर करेगी | अमेरिका , आज ईराक के अनबार सूबे मे जैसे शेखों को पैसा लुटा रहा है उसी तरह , अफगानिस्तान मे भी तालिबान के लिये पेन्शन , जमीन और अमेरिका – ब्रिटन मे राजनैतिक शरण का प्रलोभन दिया जा रहा है | 

         हरि अनंत हरि कथा अनंता | ईश्वर की कथाओं की तरह पाइपलाइनिस्तान की कहानी का भी कोई अंत नही दिखता | अब अगले खेप मे हम इस खेल के संभावित फाइनलिस्ट , सबसे सशक्त खिलाडी , चीन की चालो की ओर देखेंगे |

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