पाइपलाइनिस्तान और रूस : प्रभुत्व की लडाई

‘’प्राकृतिक खनिज संपदा द्वारा रुसी अर्थव्यवस्था के विकास की रणनीति” यह शीर्षक है उस शोध का , जो रूस के पूर्व राष्ट्रपति , अभी प्रधानमंत्री और शायद फिर भविष्य के राष्ट्रपति श्री ब्लादिमिर पुटिन ने अपने पी एच डी की डिग्री के लिये सेन्ट पीटर्स बर्ग खनिज संस्थान में प्रस्तुत किया था | अब जरा गौर करें इन समाचार शीर्षकों पर; ‘’ गैस पाइपलाइन से यूरोप के देशों मे दरार ‘’ | ‘’चीन द्वारा पुतिन वार्ता के समापन मे गैस करार ‘’|

           रूस का गैस के बाजार पर आधिपत्य ऐसे ही नहीं बना | उसके पीछे सोची समझी रणनीति है |

           बेहतर होगा कि पहली खेप में ही दिए गए तथ्यों में से तीन तथ्यों  को एक बार फिर से दोहरा लिया जाए | ये तीन तथ्य हैं – १ . रूस विश्व का सबसे बड़ा ऊर्जा उत्पादक है | २. चीन विश्व में अमेरिका के बाद दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है | ३ . यूरोप को ४० प्रतिशत गैस की आपूर्ति रूस करता है और यह संख्या २०११ और २०१४ के बाद काफी ऊँची जाने वाली है , बाल्टिक समुद्र मे दो नई      पाइपलाइनों के बनने के बाद |   

           यूरोप के २३ राजनीतिझों द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा को पिछले वर्ष दिया गया झापन ; ‘’रूस अपनी साम्रज्यवादी आकांक्षाओं के उन्नीसवीं सदी के कार्यक्रम इक्कीसवीं सदी की रणनीतियों द्वारा फिर से पूरा करने मे लगा है’’ | या एक पोलैण्ड के पूर्व सैन्य अधिकारी की टिप्पणी ‘’कल टैन्क आज तेल ‘’ |

           उन्नीसवीं सदी का कार्यक्रम , ग्रेट गेम , फिर अपने नए संस्करण में निकल रहा है | वक्त कितना भी गुजरे , शकलें वैसी की वैसी ही बनी रहती हैं | ब्राजिलियन पत्रकार पेपे एस्कोबर , जिन्होने पाइपलाइनिस्तान को नाम दिया था , का कहना है ‘’ इक्कीसवीं शताब्दी का नया खेल – तेल और गैस के लिए है , जो विशाल यूरेशिया की शंतरंज की बिसात पर जिसके काले और सफ़ेद खाने विभिन्न पाइपलाइनिस्तान के इलाके में बन रही हैं , बिछ रहे हैं | इसे इस सदी का असली राजनैतिक थ्रिलर माने |’’                                                                                                                                                                                                              रुसी प्रधानमंत्री पुतिन की पिछले वर्ष चीन यात्रा के बारे प्रेस की १५ अक्टूबर २००९ की विझप्ति ध्यान देने लायक है – “रुसी प्रधानमंत्री श्री पुतिन की ३ दिवदीय यात्रा के दौरान रूस के साइबेरिया के गैस क्षेत्रों से चीन तक दो विशाल पाइपलाइनों के बनाने पर सहमति हुई | कई अरब डालर लागत की ये पाइपलाइनें चीन की ८५ प्रतिशत जरूरतों को पूरा करने में सक्षम होंगी | “                                                                                                                                      

           रूस की सबसे बडी शक्ति उसके पास अपने ही ऊर्जा के विशाल साइबेरियन क्षेत्र हैं | जाहिर है उसके ये स्त्रोत उपभोक्ताओं को भरोसा दिलाते हैं | रूस की पाइपलाइनों के साथ बीटीसी या नाबुक्को की तरह यह समस्या नहीं है की पता नहीं तेल और गैस की आपुर्ति में , पाइपलाइनिस्तान में सतत चलतीं अशांति की वजह से , कोई बाधा भी आयी , तो रूस अपने साइबेरिया क्षेत्र की तेल और गैस की सप्लाई द्वारा उपभोक्ता को सतत तेल या गैस पहुँचाता रह सकता है | तेल या गैस जैसे पदार्थ , जिन पर पूरा आर्थिक तंत्र निर्भर करता है , यह गारन्टी बहुत महत्व की है |    

           तेल और गैस के क्षेत्र में अपना आधिपत्य बनाये रखने के लिए , रूस कजाकिस्तान , तुर्कमानिस्तान और उजबेकिस्तान के तेल और गैस क्षेत्र की पाइपलाइनों से जोड़ रहा है | यही नहीं , गैस की बढती हुई माँग को ध्यान में रखते हुए वह ‘’उत्तरी धारा ‘’ और ‘’दक्षिणी धारा’’ नाम से दो नई अत्याधुनिक पाइपलाइनो को विकसित कर रहा है | दक्षिणी धारा सीधे नाबुक्को के साथ टक्कर लेगी | १२०० किमी लंबी १५ अरब डालर (लगभग ६७५ अरब रूपये ) की लागत से बनने वाली इस पाइपलाइन के २०१५ तक पूरी हो जाने की संभावना है | यह पाइपलाइन साइबेरियन गैस काले सागर की तलहटी से होते हुये गैस को रूस से बल्गारिया पहुँचायेगी , बल्गारिया से इसकी दो शाखाएँ हो जायेंगी | एक शाखा ग्रीस होते हुये दक्षिणी इटली को गैस पहुँचायेगी , दूसरी उतरी इटली को जायेगी |

           दक्षिणी धारा यदि २०१५ में आयेगी , तो उतरी धारा तो लगभग पूरी होने पर आ गई है | ९.१ बिलियन डालर (लगभग ५० हजार करोड रूपये ) लागतवाली यह लाइन पश्चिमी रूस से बाल्टिक सागर की तलहटी पर होते हुए सीधे जर्मनी पहुँचेगी , जो आज रूस  का सबसे बडा खरीददार है | सागर की तलहटी पर लाइन बिछाकर रूस ने युक्रेन और बेलारूस में पाइपलाइन के किराये पर उठने वाले विवाद की समस्या से भी छुट्टी पा ली है | रुसी ऊर्जा कंपनी गेजप्रोम की एस पाइपलाइन मे ५१ प्रतिशत की भागीदारी है | बाकी शेयर कुछ जर्मन और डच कम्पनियों के पास हैं | निर्देशक मंडल के अध्यक्ष , और दूसरा कोई नही , जर्मनी के पूर्व चांसलर श्री गेरहार्ड श्रोडर ही हैं | उतारी धरा की इसी साल समुद्री पाइपलाइन बिछाई जा रही है और अगले साल सन २०११ में गैस का आना शुरू हो जायेगा |  

           यही नही , उतरी धारा के सामानांतर एक दूसरी नई पाइपलाइन परियोजना पर रूस ने काम करना शुरू कर दिया है | १.२ मीटर व्यास की ६००० किमी लम्बी इस पाइपलाइन का निर्माण २०१४ तक शुरू होने की योजना है |

           इन पाइपलाइनों से यदि केवल साइबेरिया की गैस भेजी जाती तो कोई बात नही थी | रूस मध्य एशिया के तेल – गैस क्षेत्रों को इन पाइपलाइनों से जोड़कर अमेरिकी योजनाओं के लिए वास्तव में जबर्दस्त मुसीबत खड़ी कर रहा है |

           २००८ के बाद से , जबसे ब्रिटिश सर्वेक्षण ने तुर्कमानिस्तान के गैसक्षेत्र  को साइबेरिया के गैसक्षेत्र के बाद दूसरी सबसे बड़ी गैसक्षेत्र  का दावा किया है , अमेरिका और यूरोप संघ दोनों तुर्कमानिस्तान के राष्ट्रपति गुरुबन्गुली बर्दीमोखाम्मेदोब को रिझाने में लगे हैं | लेकिन गुरुबन्गुली भी समय की नजाकत को पहचानते है | वह वादा सबसे – यूरोप , चीन , पाकिस्तान , भारत से कर रहे हैं | लेकिन करार किसी के साथ नहीं | अरबों डालर की परियोजनाएँ अधर में ही थीं कि २००९ में उन्होंने रुसी कंपनी गैजप्रोम से तुर्कमानिस्तान की सभी गैस की सप्लाई अगले १५ सालों तक देने का करार कर डाला |   

           वास्तव में रूस की पूरी कोशिश , मध्य एशिया (तुर्कमानिस्तान , कजाकिस्तान एवं उजबेकिस्तान ) की गैस को रुसी पाइपलाइनों से जोड कर यूरोप को रुसी गैस की तरह बेचना है | इसके लिए उसने यूरोप की गैस के भाव पर , जो अन्तराष्ट्रीय गैस के भाव से लगभग दोगुनी है , गैस का करार कर कर अपनी स्थिति मजबूत बना ली है | यह स्थिति , नाबुक्को पाइपलाइन के लिए पूर्ण विराम का संकेत देती है , और बीटीसी पाइपलाइन के लिए दिवालिया होने का |  

           इसके अतिरिक्त , नाबुक्को और बीटीसी के लिए एक महत्वपूर्ण कड़ी , टर्की , भी रुसी प्रभाव से अछूता नहीं है | आज रूस टर्की का व्यापार ३२ अरब डालर (लगभग एक लाख पचास हजार करोड रूपये ) पहुँच रहा है और दक्षिणी धारा की दोनों पाइपलाइनें काले सागर की तलहटी से होते हुए , टर्की पहुँचती हैं | रूस टर्की व्यापार का बहुत बड़ा हिस्सा रूस द्वारा टर्की को गैस की सप्लाइ से है , जो उत्तरौत्तर बढती जा रही है |

           यही नहीं , मार्च २००९ में टर्की की राजधानी अंकारा में रुसी कंपनी गैजप्रोम के प्रमुख श्री अलेक्सी मिलर और टर्की के ऊर्जा मंत्री के बीच हुए एक समझौते के बाद एक नई पाइपलाइन की भी तैयारी शुरू हो गई है | इस परियोजना के अनुसार नई लाइन को सैमसुन – केहान पाइपलाइन से जोड़  दिया जायेगा | जिसकी एक शाखा भूमध्यसागर की तली से होते हुए इजरायल के जस्केलान को जोडेगी | रुसी प्रधान मंत्री श्री पुतिन नें यह आशा जताई हैं की इजरायल और टर्की को जोडने वाली इस नई परियोजना में इजरायल का भी पूरा सहयोग मिलेगा |  

यदि टर्की और रूस में सहयोग बढता है , तो यह उन्नीसवीं सदी ग्रेट गेम से बिलकुल उल्टा होगा | यह सहयोग जार्जिया की स्थिति को और नाजुक बना देगा और नाबुक्को परियोजना पर पूरी तरह पानी फिर जायेगा | परंतु यदि टर्की अमेरिका के साथ सहयोग बनाकर , आर्मेनिया के साथ अपने संबंध सुधार लेता है , तो काकेसस क्षेत्र में रूस की स्थिति कमजोर होती है | वैसे भी हमें सेन्ट पीटर्स बर्ग खनिज संस्थान , (जहाँ से पुतिन ने पी एचडी की थी ) की ओर ध्यान बनाये रखना चाहिए | इस संस्थान के अनुसार , रूस के पास अब केवल २० साल के लिए गैस के भंडार बचे हैं | चूँकि रूस अपने गैस उत्पादन का लगभग ४० प्रतिशत निर्यात कर देता है , रुसी गैस के नाम से भविष्य में , वास्तव में मध्यएशिया की गैस जाने की संभावना है | स्वाभाविक रूप से , रूस की पूरी कोशिश यही होगी कि मध्य एशिया की गैस का बहाव , पूर्व या पश्चिम की ओर न होकर , उतर की ओर ही रहे |

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