पाइपलाइनिस्तान और चीन

चीन ने रूस के साथ तालमेल बढाते हुये : अपने मोहरे २००१ मे ही बढा दिये थे | शंघाई सहयोग संघठन बनाकर | शंघाई सहयोग संगठन के नाम से गठित इस नये आर्थिक सामरिक संगठन का उदेश्य इस महत्वपूर्ण क्षेत्र मे अपनी पकड मजबूत करने का है | शंघाई सहयोग संगठन (शससं) एक तरह से नाटो (उतरी अटलान्टिक संधि संगठन ) का जवाब है | रूस और चीन द्वारा बनाये गए इस संगठन मे रूस और चीन के अलावा कजाकिस्तान , उजबेकिस्तान , किरगीजिस्तान और ताजकिस्तान थे | बाद में भारत मंगोलिया , ईरान एवं पाकिस्तान को पर्यवेक्षक देशों के रूप मे शामिल किया गया | यह वास्तव मे यूरेशिया के एशिया वाले भाग को संगठित करने का प्रयास है |  

           चीन के सामाजिक शास्त्रअकादमी के अनुसार शससं पांच गैर पश्चिमी सम्यताओं को एक सूत्र मे पिरोने का काम कर रहा है , रुसी , चीनी , मुस्लिम , हिन्दू और बौध सम्यताएँ | और चूँकि सभी मुख्य सभ्यताएं इसमे जुड रही हैं , शससं यूरेशिया को सुरक्षा और स्थायित्व देगा | 

           बेजिन्ग के अनुसार , इक्कीसवी सदी के विश्व का शक्ति संतुलन , मुख्य रूप से चार पाये पर खडे ब्रिक (ब्राजील , रूस , भारत और चीन ) के देश करेंगे | इनमे यदि मुस्लिम त्रिकोण ,ईरान , सऊदी अरब और टर्की का , संयुक्त लैटिन अमेरिकी देशों के साथ जोड दिया जाये तो बृहत भौगोलिक शससं की भूमिका बनती दिखाई देती है , जिसकी कल्पना भी रोमांचकारी है | शससं की बढोतरी , यूरेशिया मे अमेरिका के सभी इरादों पर पानी फेरती नजर आती हैं |

           ईरान पश्विमी एशिया को ऊर्जा के स्त्रोतो में एक महत्वपूर्ण कडी है | लेकिन अमेरिका द्वारा प्रेरित प्रतिबंधो ने उसकी आर्थिक स्थिति ख़राब कर दी है | इससे उबरने के लिये लगभग २०० अरब डालर (लगभग ९० हजार करोड रुपये ) की पूंजी की जरुरत है | प्रतिबंधो के चलते और देश जब हिचकिचा रहे हैं , चीन ने आगे आकर ईरान के ऊर्जा क्षेत्र के बुनियादी ढाँचे को विकसित करने के लिए १२० अरब डालर (लगभग ५५ हजार करोड रूपये ) के निवेश करने की घोषणा हाल मे ही की | कहना न होगा , चीन की अर्थव्यवस्था , आज जब पश्चिमी अर्थव्यवस्था मंदी से जूक रही है , १० प्रतिशत की दर से वढोतरी उसके ऊर्जा क्षेत्र को सुनिश्चित करने की कोशिश को और पैना बना देती है | २००९ मे ही चीन और ईरान ने ३.२ अरब डालर ( लगभग १३००० करोड रुपये ) का ईरान के पार्स गैस क्षेत्र को विकसित करने के लिये करार किया | यह सभी अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान को अलग थलग करने की कोशिशों मे रोडा अटकाती हैं |

           यही नही , दिसम्बर २००९ मे चीन ने तुर्कमानिस्तान के साथ भी गैस सहयोग का करार कर लिया है | २६ अरब डालर ( लगभग एक लाख सत्रह हंजार करोड रुपये ) की यह विशालकाय अब तक की सबसे मँहगी पाइपलाइन परियोजना , तुर्कमानिस्तान की गैस को उजबेकिस्तान और कजाकिस्तान होते हुये पश्चिमी चीन के सिन्कियांग प्रांत तक पहुँचायेगी |                                              चीन का मुस्लिम बहुल प्रांत सिन्कियांग एक दूसरी महत्वपूर्ण कडी यूरेशिया और मध्यपूर्व के खेल मे है | सिन्कियांग , सांस्कृतिक और भूसामरिक द्रष्टि से , चीन और मध्यपूर्व जिससे चीन अपने संबंध उतरोत्तर मजबूत करने की कोशिश कर रहा है , के बीच पुल का काम करता है | चीन ओमान , सऊदी अरब और यमन से अरबों बैरल का तेल आयात कर रहा है | जाहिर है की मध्यपूर्व के देश भी अपनी सम्पति और सुरक्षा के लिये , यदि अमेरिकी अर्थव्यवस्था मे बदलाव नही आता , तो चीन की ओर देखेंगे |  

           वास्तव मे चीन ने यूरेशिया के खेल मे अमेरिकी और इजरायेली योजनाओ में जबर्दस्त दरार डाल दी है | इजरायल के प्रधानमंत्री श्री बेन्जामिन नेतन्याहू ने इजरायल के सामने तीन खतरों का जिक्र किया | १. ईरान का खतरा , २. मिसाइलों के बढाव का खतरा , ३. गोल्डस्टोन का खतरा ( संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा गठित कमेटी द्वारा प्रेषित इजरायल द्वारा गाजा मे संधर्ष पर रिपोर्ट ) जिसने पूरे विश्व द्वारा इजरायल की भर्त्सना को प्रेरित किया |

           चीन की पारम्परिक ऊर्जा स्त्रोतो के अलावा उभरती हुई प्रदुषण रहित तकनीकियों के विकास मे भी एक प्रमुख भूमिका है | आज पूरे विश्व मे गैरपरम्परागत ऊर्जा के स्त्रोतों के विकास और पारम्परिक ऊर्जा के उपयोग मे बचत पर बहुत ध्यान दिया जा रहा है | इन सभी मे प्राकुतिक रूप से पाये जाने वाले रेयर अर्थ के नाम से पहचाने जाने वाले पदाथों की एक प्रमुख भूमिका है | चीन का इन पदार्थो   के उत्पादन मे ९० प्रतिशित हिस्सा है | जैसे जैसे चीन की अपनी ऊर्जा की जरूरते बढती जायेंगी वह इन पदाथो के निर्यात मे कभी करता जायेगा | अमेरिका को इन सभी से परेशानी है |

           मुस्लिम बहुल सिन्कियांग प्रांत चीन के ऊर्जा परिवहन मे एक जंक्शन का काम करेगा | विशेषकर तुर्कमानिस्तान एवं कजाकिस्तान द्वारा लाई जाने वाली तेल और गैस के लिये ( चीन द्वारा किये जा रहे तेल और गैस के इन सौंदों का पाइपलाइनिस्तान के मुस्लिम समाजों पर दूरगामी प्रभाव पड सकता है ) | सिन्कियांग न केवल मध्यएशिया द्वारा लाई जा रही गैस की पाइपलाइनों को रास्ता देगा , बल्कि सिन्कियांग मे खुद ऊर्जा की बडी संभावनाएँ मौजूद हैं | सिन्कियांग के ही गैस क्षेत्र के दोहन के लिये चीन ने पश्चिम पूर्व पाइपलाइन बनाई है |     

           चीन का अरब देशो से बढते हुए संबंध और ईरान के साथ ऊर्जा संबंधित करार , अमेरिका और इजरायल के ईरान को हाशिये मे करने के प्रयत्न को नकार सकती हैं | इससे यह नही समझना चाहिए कि चीन को इस्लाम से कोई लगाव है | मुस्लिम बहुल सिन्कियांग प्रांत मे थोडी सी अशांति पर ही कठोर कदमों द्वारा उइघुर मुस्लिम नागरिकों को दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया गया है | सिन्कियांग मे , तिब्बत की ही भांति , बडे पैमाने पर हान चीनी लोगो को बसाकर चीन ने जनसंख्या मे महत्वपूर्ण बदलाव ला दिए हैं | वास्तव मे चीन की नीतियाँ दूरगामी परिणाम को देखते हुए , असंवेदन शील होकर बनाई जाती है | उन्हे अगले चुनाव मे स्थानीय जनता पर इन कार्यो का क्या प्रभाव पडेगा , इसकी चिन्ता नही करनी होती | चीन दक्षिण एशिया मे हमारे पडोश पाकिस्तान मे भी अपने पैठ बना रहा है | पाकिस्तान के बलोचिस्तान प्रांत मे उसने २० करोड डालर (लगभग ९०० करोड रूपये ) की लागत से ग्वादर मे एक गहरे पानी वाला बंदरगाह विकिसित किया है  , जिसके इस्तेमाल के लिये पाकिस्तान ने उसे सार्वभौमिक गारन्टी दी है | ग्वादर बंदरगाह फारस की खाडी मे स्थित होरमुज जहाँसे खाडी का सारा तेल गुजरता है , केवल ४०० कि.मी. की दूरी पर है | यहाँ से चीन पूरे तेल की आवाजाही पर नजर रख सकेगा | ग्वादर बंदरगाह तापी (तुर्कमानिस्तान , अफगानिस्तान , पाकिस्तान , इन्डिया ) की कागजी पाइपलाइन की भी एक महत्वपूर्ण कडी है , जहाँ से तापी पाइपलाइन द्वारा लाया गया तेल जहाजो द्वारा भेजा जा सकेगा |    

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