पाइपलाइनिस्तान और अमेरिका की बेचैनी

’विश्व मे अमेरिकी प्रभुत्व को बनाये रखने के लिये जहाँ उर्जा के श्रोत और रास्ते है वहां सामरिक सहयोगी भागीदार की जरूरत है | यह पूरे यूरेशिया क्षेत्र मे सामरिक संगठन मे अधिक सहयोग से संभव है’’ ये शब्द थे श्री ब्रेजिन्स्की के , जो अमेरिकी राष्ट्रपति कार्टर के सुरक्षा मामलो के सलाहकार थे |

         पाइपलाइनिस्तान के सभी महत्वपूर्ण स्थानो पर अमेरिका ने मैकिन्डर के सिध्धांतो को ध्यान मे रखते हुये सैनिक ठिकाने बना  लिये हैं | १९ वीं शताब्दी के खेल मे यह शायद निर्णायक साबित होता परंतु २१ वीं शताब्दी के १९ वीं शताब्दी नही है | ईराक और अफगानिस्तान में लगभग २००० अरब डालर ( १४० लाख करोड रूपये ) फूकने के बाद भी, इस इलाके मे पकड़ तो दूर, इज्जत से भागने के भी लाले पड़ रहे हैं |   

         अमेरिका की मुसीबत रूस , चीन और ईरान हैं | रूस का आज तेल और गैस की पाइपलाइनो पर लगभग एकाधिकार है | किसी भी परिवर्तन से उसमे टकराव आना ही है | चीन, अमेरिका के बाद, उर्जा का सबसे बडा खरीददार है | जाहिर है , वह इतने महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले मे अमेरिका पर निर्भर नही रहना चाहेगा | ईरान, रूस के बाद गैस का  सबसे बड़ा उत्पादक है | उसे अपने गैस के लिये बाजार चाहिये | उसके लिये वह सब तरफ हाथ पैर मार रहा है | अमेरिकी विरोध इसमे सबसे बडा रोड़ा है |   

           वैसे तो अमेरिका के पास गैस का अपना काफी बडा श्रोत है | अमेरिका ने तार भरी बालू ,और शेल , जो अमेरिका और कनाडा मे बहुत बडी मात्रा मे मौजूद है ,  से  तेल और गैस निकालने की तकनीक विकसित कर ली  है | तेल और गैस के दाम गिरने का एक कारण इस नये श्रोत से गैस का उत्पादन भी हैं | लेकिन उससे वैश्विक प्रभाव  तो नही मिलाता | पाइपलाइनिस्तान मे उसे अकूत मुनाके की संभावना दिखाई देती है |

         वैसे भी अमेरिकी राजनीति पर दो उधोग हावी रहते हैं | तेल उधोग और सामरिक शस्त्र का उधोग | पाइपलाइनिस्तान दोनो उधोगों के लिए अकूत मुनाके का श्रोत दिखाई देता है | 

         यूरेशिया की ट्रेन पटरी पर से उतर गई है , या यूं कहे , अगवा कर ली गई है , क्योकि यूरेशिया मे एशिया वाला हिस्सा कुछ दूसरा सोच रहा है | तेल और गैस, योरोप और अमेरिका से एशिया की ओर शक्ति एवं समृद्धिं के स्थानांतरण मे महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा | अंत मे जयमाल किसके गले मे पड़ेगी यह कहना तो मुश्किल है , लेकिन कम से कम अमेरिका के गले मे तो पड़ती नहीं लगती |

   दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से अमेरिका मे जितने भी विदेश सचिव हुये है उनमे से दो को छोड़कर सभी , किसी न किसी तरह तेल उधोग से जुड़े रहे हैं | अपवाद हैं , एलेन डलेस और कालिन पावर | कालिन पावर के समय उनको छोड़कर लगभग पूरा प्रशासन , राष्ट्रपति बुश समेत , सभी तेल उधोग से संबंधित थे | उप राष्ट्रपति डिक चेनी फोर्च्यून ५०० मे आने वाली १ लाख से ज्यादा कर्मचारियों , १३० देशो मे ब्रान्च , वाली तेल उघोग को सेवा एवं संसाधन जुटाने वाली हैलीबर्टन कम्पनी के निर्देशक रहे हैं | चेनी एवं बुश दोनो चेनी द्वारा निर्देशित कम्पनी अर्बुस्तो मे साथ काम करते थे | अर्बुस्तो ने मुनाफा कमाया हो या ना  कमाया हो, लेकिन धनी अरब शेखों का लाड़ला जरुर रहा है | अर्बुस्तो के निर्देशको मे एक , जेम्स बाथ  जिसके बुश सीनियर से घने संबंध थे, खाडी के देशो मे काले पैसों को सफेद करने के लिए विख्यात था | उसके ग्राहको मे एक , सलेम बिन लादेन , ओसामा बिन लादेन के १७ भाईयों मे से एक था |  

  कालिन पावर के बाद की अमेरिकी विदेश सचिव श्रीमती कोन्डोलेजा राइस , अमेरिकी  तेल कंपनी शावेरान की डाइरेक्टर और मध्य एशिया के मामलो की सलाहकार थीं | राइस की सलाह पर शावेरण ने कजाकिस्तान में लगभग २० अरब डालर ( १४०००  करोड  रूपये ) का निवेश किया | शावेरान ही है जिसे , तापी पाइपलाइन ( तुर्कमानिस्तान , अफगानिस्तान , पाकिस्तान , इन्डिया ) जिसकी अभीतक शुरुआत होती भी नही लगती , का ठेका मिला हुआ है | तापी निर्माण के लिये जरुरी है कि अफगानिस्तान अमेरिका के नियंत्रण मे हो , तालिबान को दबाकर या उनसे सौदा कर कर , पाकिस्तान काबू मे बना रहे और भारत भी साथ दे | यह कबतक संभव होगा  , या संभव होगा भी या नही , भविष्य ही बतायेगा |  

        सोवियत संघ के विघटन के बाद से ही नाटो ने तेजी से वारसा सन्धि की जगह लेने की कोशिश शुरू कर दी थी | पहला बहाना बना , अल्बानियन अल्पसंख्यकों की कोसोवो मे रक्षा | लेकिन साथ मे यदि अमेरिकी डच कम्पनी अल्बानियन मैसेडोनियन बल्गारियन आयल कार्पोरेशन (अम्बो) मे 12 अरब डालर की तेल की पाइपलाइन , रूस और ईरान दोनो की भूमि को बचाते हुए बना दी तो क्या जाए, आखिर जिनको बचाया है उनकी आर्थिक प्रगति की भी तो जिम्मेदारी मुक्तिदाताओ पर ही होगी | अम्बो पाइपलाइन 2012 से कैस्पियन सागर के तेल को जार्जिया , तुर्की , बल्गारिया , मैसेडोनिया और अल्बानिया होते हुए , योरोप पहुँचा रही है | फिर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई की बारी आई | पहले साम और दाम से काम चलाने की कोशिश की गई |अमेरिकी प्रशाशन , राष्ट्रपति किलन्टन के समय मे 1996 मे ही , तालिबान प्रतिनिधि मंडल को हूस्टन मे आव भगत कर रिझाने की कोशिश कर चुका था | आव भगत की अगुआई और कोई नही श्री खलीलजाद और श्री अहमद करजाई कर रहे थे, जो उस समय यूनोकोल अमेरिकी तेल कंपनी के प्रतिनिधि थे | खूब खिलाया (पिलाया नही) गया | लेकिन तालिबान वैसे चाहे कितने ही पिछड़े और क्यों न हों सौदेबाजी के मामले मे पक्के निकले | तेल कंपनियो को 10 करोड़ डालर (लगभग 700 करोड़ रुपये ) सालाना रायल्टी पाइपलाइन अफगानिस्तान से गुजरने के लिये पेश किया गया लेकिन बात नहीं बनी | साम्राज्य के गुस्से का ठिकाना न रहा | अंत मे साम्राज्य को उन्हे रास्ते पर लाने के लिये कदम उठाने पड़े | यही खालिजाद और करजाई जो तालिबान की अमेरिका मे आव भगत कर रहे थे, आतंकवाद की लड़ाई के बाद अफगानिस्तान में अमेरिका के राजदूत और अफगानिस्तान के राष्ट्रपति बन गये | फिर जार्जिया की बारी आई, जहाँ से रूस की भूमि बचाने के लिये हर पाइपलाइन को गुजरना पड़ता है | अब रूस , ईरान और चीन, यदि कोसोवो का युद्ध , अफगानिस्तान मे आतंकवाद के खिलाफ युद्ध , जार्जिया का संघर्ष , इन सबको अगर पाइपलाइनिस्तान का युद्ध न समझें , तो क्या करें |           

अमेरिका यदि पूर्व मे तापी पाइपलाइन पर निर्भर है तो पश्चिम मे नाबुक्को और बीटीसी (बाकू त्बिलिसी केहान ) पाइपलाइनो पर | इन दोनो पाइपलाइनो की स्थिति ज्यादा ही नाजुक लगती है | बीटीसी जिसका शुरुआत मे ही जिक्र हो चूका है , जार्जिया मे रुसी हस्त क्षेप के बाद अपना आकर्षण अमेरिका के लिये खो चुकी है | 

दूसरी  पाइपलाइन अमेरिका की अम्बो ( अल्बानियन मैसेडोनियन बल्गारियन आयल कम्पनी ) बना रही है | लगभग ११ अरब डालर (७७००० करोड रूपये )की लागतवाली यह पाइपलाइन , कैस्पियन सागर क्षेत्र से तेल जार्जिया के तेल टरमिनल तक पहुँचाएगी | वहाँ से टैंकरों द्वारा तेल को काले सागर पर स्थित बलगारिया के बंदरगाह बुर्गास तक पहुँचाया जायेगा, जहाँ से एक दूसरी पाइपलाइन द्वारा तेल मैसेडोनिया और फिर अल्बानिया के बंदरगाह ब्लोरा तक पहुँचेगा | जाहिर है कवायद खासी लम्बी है | जार्जिया के दुबारा रुसी प्रभाव मे जाने की तो समस्या है ही , यदि इन इलाके के दूसरे माफिया संगठनो को नकार भी दिया जाये तो भी | वास्तव मे रुसी सैनिक हस्तक्षेप ने ब्रेजिन्स्की के सपनों की धज्जियाँ उड़ा दी है |  

अजरबैजान मे अमेरिका को पहली बड़ी सफलता मिली थी | अजरबैजान १९९१ मे सोवियत संघ से अलग होकर एक स्वतंत्र देश बना | अमेरिकी राष्ट्रपति प्रेसिडेन्ट कार्टर के सलाहकार ब्रेजिन्स्की जिनका जिक्र शुरू मे ही आ चुका है , १९९५ मे अजरबैजान के तत्कालीन शाशक से मुलाकात की और बीटीसी पाइपलाइन के लिये तैयार किया | लेकिन जार्जिया मे रुसी सैनिक हस्तक्षेप के बाद अजरबैजान की निगाहें भी बदलने लगी है | फिर अजरबैजान के राष्ट्रपति इतहाम अलियेब और जार्जिया के राष्ट्रपति मिखाइल सकाशदिली के बीच ३६ का आंकडा है | यह अमेरिकी परियोजना को और मुश्किल बना देता है|

अमेरिका की आशाऍ अब नाबुक्को पाइपलाइन पर है | आप पूछेंगे की नाबुक्को का पूरा नाम क्या है तो जनाब इसका पूरा नाम नाबुक्को ही है | नाबुक्को वास्तव मे एक वर्दी इटैलियन नाटककार रचित ओपेरा के एक पात्र का नाम है | आप पूछेंगे के ओपेरा का पाइपलाइन से क्या लेना देना | तो हुआ ऐसा कि नई पाइपलाइन के सिलसिले मे आस्ट्रिया और टर्की के गैस अधिकारीयो की बैठक सन २००२ मे  वियना मे हुई, जहाँ उन्होने यह वर्दी रचित ओपेरा देखा | राजा नाबुक्को द्वारा निस्काशित यहूदियों की और उनके संधर्ष के बीच पनपी प्रेम कहानी ने सदस्यों को ऐसा प्रभावित किया कि उन्होने पाइपलाइन का नाम ही नाबुक्को रख दिया | लगभग ११ अरब डालर ( ७७०००० करोड रुपये ) के लागत की यह ३३०० किलोमीटर लम्बी पाइपलाइन की योजना २००४ मे कागज पर पूरी हुई | जमीन पर शुरुआत , होने का आज भी इतजार है | पाइपलाइनिस्तान मे चाहे बीटीसी हो या नाबुक्को, अमेरिका की मुश्किल एक ही है | उसके नियंत्रण मे गैस या तेल का श्रोत नही है | अत: उसे यह पता नही की अरबों डालर लगा कर बनाई गई – पाइपलाइने वास्तव मे तेल और गैस, बाजार मे पहुचाकर मुनाफा कमायेगी या मील के पथ्थर की तरह केवल राहगीरो के लिये दिशा निर्देश का काम करेंगी | वैसे अमेरिका मे पिछले ३० वर्षो मे एक ही उधोग अच्छा चल रहा है | डालर छापने का उधोग | जब तक चीन , भारत सहित विश्व के सभी देश हरे कागज के बदले मे अपने मजदूरों के परिश्रम से बने उत्पाद अमेरिका को देते रहेंगे , अमेरिका को इसकी विशेष चिन्ता नहीं है | खैर डालर की तो एक अलग ही कहानी है जो फिर कभी कही जायेगी | अभी हम पाइपलाइनिस्तान के ही दूसरे खिलाड़ियों की चालो पर अपना ध्यान बनाये रखेंगे | आइये अपने ही घर की ओर चलें और देखें कि भारतीय उपमहाद्वीप मे पाइपलाइनिस्तान के लिये क्या खेल खेले जा रहे हैं |

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