धौंस जमाते चीन से कैसे निपटें

डोकलाम  मे महीनों आँखों में आँखे डालकर डटे रहने के बाद पीछे हटाने के बावजूद , चीन भारत पर धौंस  ज़माने का कोई मौका नहीं छोड़ता दिख रहा है | पाकिस्तान के साथ उसकी बढ़ती हुई दुरभि संधि भारत के लिए और भी मुश्किलें बढ़ा देती हैं | लगभग ४००० किलोमीटर लंबी सीमा का चीन के साथ विवाद स्थल होना अपने आप मे एक बड़ी मुसीबत है | डोकलाम विवाद के समय चीनी विदेश विभाग और चीनी मीडिया का भारत को खुलकर युद्ध की धमकी देना , और आज भी भारत को डोकलाम से सीख लेने की नसीहत ; यह दर्शाती है कि भारत चीन के संबंध लम्बे समय तक तनाव पूर्ण रहने वाले है |  

             ऐसा नहीं है कि चीन के केवल भारत के साथ संबंध तनाव पूर्ण हैं | ऐसा करीब करीब सभी पड़ोसियों के साथ है | जापान , ताईवान , दक्षिण कोरिया , वियतनाम , फ़िलिपाइन्स आदि सभी पड़ोसियों के साथ चीन के संबंध तनावपूर्ण ही हैं | चीन सभी पर धौंस जमाने का प्रयास करता ही रहता है | खासतौर पर राष्ट्रपति शी के सता पे आने के बाद यह कुछ बढ़ता ही नजर आता है | अब जब राष्ट्रपति शी का कार्यकाल शायद माओ की तरह आजीवन हो गया है , भारत के लिए संकेत अच्छे नहीं हैं |    

            चीन के अधिकतर पड़ोसी , जापान , वियतनाम , फिलिपाईन्स आदि चीन की हठघर्मी     के आगे अधिकतर झुकते आये हैं | कोई उनसे पंगा नहीं लेना चाहता | इसी लिए डोकलाम मे जब भूटान के बजाए भारतीय सैनिक डट गए और उन्होने पीछे हटने से मना कर दिया , चीन भौंचक्का रह गया और खीझ कर उसने युद्ध की धमकी और दूसरी जगहों पर छेड़छाड़ शुरू कर दी |

            चीन आज व्यापार मे विश्व की सबसे बड़ी शक्ति है | सैन्य शक्ति मे भी वह अमेरिका के बाद दुसरे नंबर पर है , हालांकि अमेरिका और चीन की सामरिक शक्ति मे बहुत अंतर है | ऐसे मे भारत चीन के साथ कैसे निबटे | सन 2015 मे चीन का व्यापार 3963.53 अरब डालर का था और सेवा मे व्यापार 755.44 अरब डालर | चीन की जीडीपी लगभग 11000  अरब डालर की है और उसकी सेना का बजट 150 अरब डालर से भी कुछ ऊपर है | ऐसे मे भारत , जिसकी जीडीपी केवल 2500 अरब डालर की  है और सेना पर खर्च लगभग 50 अरब डालर , चीन का मुकाबला कैसे करे |                                               चीन की शक्ति का स्त्रोत उसकी  उत्पादन क्षमता और विश्व बाजार मे निर्यात  द्वारा अर्जित किया गया प्रभुत्व है | 2015 मे चीन का उत्पादन निर्यात 2282 अरब डालर था जब कि आयत केवल 1682 अरब डालर | यह 2282 अरब डालर की निर्यात की कमाई मुख्य रूप से चीन की अर्थव्यवस्था को चलाती है और करोड़ो की संख्या मे चीनी नागरिकों को रोजगार देती है | 2008  मे वैश्विक मंदी के चलते चीन के निर्यात मे 30 प्रतिशत की कमी आई थी फलस्वरूप उस वर्ष चीन मे लगभग 2 करोड़ लोग बेरोजगार हो गए थे | लाखों चीनी मजदूरों को शहरों से वापस गांव लौटना पड़ा था | जिससे चीनी समाज मे बहुत तनाव और सधर्ष का माहौल पैदा हो गया था | फिर 600 अरब डालर विदेशी मुद्रा भंडार मे प्रतिवर्ष बढ़ोतरी , चीन को ओबोर जेसे प्रोजेक्ट  चलाने की क्षमता देते हैं | इस प्रकार की पुंजी निवेश चीन को अपना प्रभाव बढ़ाने मे मदद करती है |                                                                                                

चीन का विदेशी मुंद्रा भंडार लगभग 3000 अरब डालर का है | चूँकि  अधिकतर विदेशी मुद्रा डालर मे है , उसे अमेरिकी ट्रेजेरी के बांड मे निवेश किया गया है , जिसमे केवल 1.5  प्रतिशत की ही आय होती है | इस धन को दुसरे देशों को 5-6  प्रतिशत पर कर्ज देकर वहाँ पर सड़क आदि बुनियादी ढ़ांचे की योजनाएँ कार्यान्वित करना चीन के लिए एक बेहद फायदे का सौदा है | इन सभी परियोजनाओं मे , लोहा ,  सिमेन्ट , यहाँ तक कि मजदूर चीन से जाते हैं ; इस तरह पूरी पूँजी फिर चीन के पास वापस निर्यात के तौर पर पहुँच जाती है | मित्र देश को ऊपर ॠण खड़ा हो जाता है , जिस पर 5-6  प्रतिशत , ( या उससे भी  अधिक ) व्याज देना पड़ता है | फिर जब ऋणी देश कर्ज नहीं चुका पाते , चीन परियोजना पर कब्ज़ा कर लेता है अथवा बदले मे हजारो वर्ग किलोमीटर जमीन हथियाता है | श्रीलंका को हंबनटोटा बंदरगाह और ताजिकिस्तान मे यही हुआ और जब शायद ग्वादर पाकिस्तान मे यही कहानी दोहराई जाने वाली है |

चीन मे 2015  की निर्यात के 2282  अरब डालर निर्यात  में किन उत्पादों का निर्यात  हुआ इसकी जांच करें तो हम पाते हैं की  42.3 प्रतिशत , या लगभग 1000 अरब डालर का निर्यात केवल दो प्रोडक्ट्स  केटेगरी मे किया गया | ये उत्पाद हैं , इलेक्ट्रिकल मशीनें और उत्पाद , जो कुल निर्यात का 26.3  प्रतिशत है और दूसरा मशीने , जो कुल निर्यात का 16 प्रतिशत है | यह तथ्य हमको हथियार देता है जिससे हम चीन को वाकई नुकशान पहुँचा सकते हैं | चीन के भारत को निर्यात पर रोक लगाने , हमारे चीनी मॉल न खरीदने या आयातकर बढ़ाने से खास फर्क नहीं पड़ेगा | चीन का भारत को निर्यात लगभग 70  अरब डालर का है , वह चीन को कुल निर्यात का लगभग 3 प्रतिशत है | यदि हम पूरा आयात रोक भी सकें तो चीन को बहुत फर्क नहीं पड़ेगा | परंतु यदि हम इंजीयरिंग निर्यात का आधा हिस्सा किसी तरह चीन से छीन सकें तो यह चीन के लिए तबाही का संदेश होगा | अत : हमे , किसी भी तरह , चीन से चीन से इंजीनियरिंग निर्यात का 50 प्रतिशत हिस्सा छीनने का प्रयत्न करना चाहिए | इसके लिए कुछ भी करना पड़े , हमे करना चाहिए | इसको हमे एक व्यापारिक चुनोती न समझकर , सामरिक चुनौती के तौर लेना चाहिए | चीन को उसकी जगह पर बैठाने का इससे अच्छा और कोई तरीका नहीं दिखता कि हम उनसे उनका 500  अरब डालर का निर्यात बाजार छीन लें | इसके लिए यदि हमे घाटा भी उठाना पड़े तो उठा लेना चाहिए, क्योंकि, यह रक्षा पर लिए जाने वाले किसी भी खर्चे से ज्यादा प्रभावी होगा |  

         यदि चीन 500 अरब डालर का इंजीनियरिंग निर्यात  का बाजार भारत के हाथों खो देता है ,  लगभग दो से ढाई करोड़ चीनी मजदुर बेकार हो जाएँगे और चीन के गांव गांव मे अशांति फैल जाएगी | चीनी सेना ( पी एल ए )  का पूरा ध्यान भारत चीन सीमा से हट कर , करोड़ों  असंतुष्ट , छटनी किए गए मजदूरों को दबाने मे लग जाएगा |  दूसरी ओर , यदि हम 500 अरब डालर का यह निर्यात चीन से छीन सकें तो हमारा निर्यात लगभग तीन  गुना हो जाएगा | भारत मे ढाई से तीन  करोड़ लोगों को रोजगार मिलेगा | सकल धरेलू उत्पाद ( जी डी पी ) मे वृद्धि होगी और विदेश व्यापार घाटे की जगह हम व्यापार मुनाफे वाली स्थिति मे  आ जाएगें  |  

         सौभाग्यवंश , भारत मे इंजीनियरिंग उघोग मे एक सशंक्त धरातल अभी से मौजूद है , जो गुणवता के उत्पाद बना कर निर्यात कर सकें | लार्शन ऐन्ड टुर्बो , गेल ,  इ सी आइ एल , सिमेन्से , ए बी बी , हिताची , अरोवा जैसी कंपनियाँ भारत मे अभी भी कार्यरत हैं जो विश्व मे किसी भी कंपनी से मुकाबला करने मे समर्थ हैं | हम और अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों की , चीनी कंपनियों समेत , भारत मे उधोग लगाने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं | हमे उधोग और विश्व व्यापार मे अधिकतम भागीदारी चाहिए | वह भारतीय कंपनियाँ करें या विदेशी ( चीन सहित ) उससे बहुत फर्क नहीं पड़ता |         इस लक्ष्य को पाने के लिए हमे निवेशकों और उधोगों को  हर संभव प्रोत्साहन समर्थन एवं सहयोग देना चाहिए | निर्यात बढ़ाने के लिए प्रोत्साहनों मे , आयकर मे सेक्सन 80 H H C  मे छूट एक अत्याधिक प्रभावी प्रोत्साहन है | व्यापारियों और उधोगपतियों को आयकर न देना पड़े , इस से ज्यादा बड़ा कोई आकर्षण नही होता | 90 के दशक मे जब 80 H H C  लागू था , भारत के निर्यात व्यापार मे लगातार बढ़ोतरी हुई | फिर 2003 मे तत्कालीन  वित्तमंत्री श्री यशवंत सिन्हा जी ने , इस तर्क के आधार पर की आय आय होती है , निर्यात से हो या आयात से सेक्शन 80 H H S  को  निरस्त कर दिया | आदरणीय यशवंत जी  का आदर करते हुए हम उनसे  असहमत होना चाहेंगे | हर आय  एक जैसी  नही होती | जब हम आयात करते हैं तो हम विदेशी मजदूरों की मेहनत का मूल्य चुकाते हैं | जब हम निर्यात करते हैं, तब विदेशी, हमारे मजदूरों की मेहनत का मूल्य चुकाते है | निर्यात भारत मे नौकरियों को बढ़ाता है , आयात  भारत मे नौकरियों मे कमी लाता है | हाँ , व्यापारी या उधोगपति के लिए दोनो आय मे  कोई फर्क नही | परंतु देश की अर्थव्यवस्था पर फर्क पड़ता है | आज चीन की अभूतपूर्व प्रगति उसके निर्यात को प्रोत्साहन का परिणाम है |

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