खुदा को किसने बनाया

बात कुछ पुरानी है | सन १९२१ मे गाँधीजी ने , भारत मे स्वराज्य के लिये , सविनय अवझा आंदोलन चलाया | प्रथम विश्वयुद्ध के ठीक बाद ही यह आंदोलन चलाया गया | प्रथम विश्वयुद्ध मे तुर्की ने जर्मनी का साथ दिया था और युद्ध के अंत मे उसकी पराजय हुई थी | युद्ध के समय , तुर्की मे खलीफा के शासन था , जिसे पुरे विश्व के मुसलमान अपना सुलतान मानते थे | पराजय के बाद , तुर्की का साम्राज्य तोड़ दिया गया | उसके राज्य के टुकड़े कर ईराक , सीरिया , लेबनान आदि नये राज्य बने | उत्तरी अफ्रीका को अंग्रेजों और फ्रान्सिसियों ने आपस मे बाँट लिया और खलीफा को गद्दी से उतार दिया गया | बाद मे तुर्की मे अब्दुल कमाल पाशा के नेतृत्व मे क्रांति हुई और इस प्रकार सदियों से चले आ रहे खलीफा के साम्राज्य का अंत हो गया |

        खलीफा के हटाये जाने का पूरे विश्व के मुसलमानों ने विरोध किया | भारतीय मुसलमानों ने भी इस विरोध मे जोरशोर से हिस्सा लिया | अत : जब गांधीजी ने सविनय अवझा आंदोलन का कार्यक्रम सबके सामने रखा तो भारतीय मुसलमानो के असंतोष को ध्यान मे रखकर , खलीफा को तुर्की मे दुबारा स्थापित करने की माँग भी अन्य माँगो के साथ शामिल की गई और इस आंदोलन का नाम खिलाफत आंदोलन भी रखा गया | आंदोलन ने काफी जोर पकड़ा और हिन्दू और मुसलमानों, दोनों ने उस मे जोर शोर से हिस्सा लिया | भारत के स्वतंत्रता की लड़ाई मे यह अकेला ऐसा आंदोलन है जिस मे काँग्रेस और मुस्लिम लीग दोनो ने एक साथ गाँधीजी के नेतृत्व मे हिस्सा लिया था |

        इसी आंदोलन के तहत श्री अंबिका प्रसाद बाजपेयी , मौलाना अब्दुल कलाम आजाद और एक हाजी साहब जेल के एक बैरेक मे साथ साथ बंद थे | श्री अंबिका प्रसाद बाजपेयी को ‘’ संपादकाचार्य ‘’ के नाम से जाना जाता है , क्योंकि उन्होंने हिन्दी के पहले दैनिक समाचार पत्र ‘’ विशाल भारत ‘’ का संपादन किया था | जेल मे राजनैतिक कैदियों को कोई काम तो होता नहीं , अत ; बातें और वाद विवाद मे ही समय कटता था | एक बार हाजी साहब और बाजपाई जी मे खुदा के बारे मे बातें होने लगी | बातों मे हाजी साहब ने बाजपाई जी से पूछा ‘’ खुदा को किसने बनाया |’’ बाजपेईजी ने जवाब दिया ‘’ बेवकूफों ने ‘’ | श्री मौलाना आजाद बगल मे ही थे | मौलाना आजाद फारसी और अरबी के विद्धान थे और इस्लामिक धर्म और दर्शन पर उनकी गहरी पकड़ थी | वे यह जवाब सुनकर बुरी तरह चौंके और उन्होंने बाजपाई जी से कुछ तल्ख़ होकर पूछा ‘’ ऐसा कैसे कह सकते हो तुम ‘’ | बाजपेई जी ने जवाब दिया ‘’ देखिये , आप यह शेरवानी पहने हुए हैं , यदि आप से मै पूछूँ की यह शेरवानी कैसे बनी तो आप कहेंगे की कपास को लिया गया उसे चर्खे पर काट कर धागा बनाया गया , धागे को एक करघे पर लगा कर कपड़ा बुना , उसी कपड़े को रंगरेज ने रंगा , दर्जीने काटा और सिलकर शेरवानी बना दी | अब अगर मै आप से पूछूँ की बीज मे से कपास कैसे बन गया तो आप क्या जवाब देंगे | यही कहेंगे की वह तो खुदा का ही करिश्मा है | अब खुदा कब आया , जब हमारी जानकारी ख़त्म हुई | अझानता सामने आई | फिर खुदा हमारी बेवकूफी से ही तो निकला माना जाएगा ‘’ |

        वास्तव मे बाजपेई जी के तर्क मे दम है | खुदा , ईश्वर , गोड या भगवान , एक विचार है , एक ख्याल है , एक संकल्पना है | ईश्वर ने हमको नहीं बनाया , हमने ही ईश्वर का ईजाद किया | किसी भी संकल्पना को व्यक्त करने के लिये शब्दों की जरुरत होती है | शब्द और भाषा , मानवों ने बनाई , ईश्वर ने नहीं | यदि किसी से कहा जाय की वह ईश्वर के अस्तित्व के बारे मे बताए लेकिन शब्दों का प्रयोग न करें , तो कुछ किया  ही नहीं जा सकता | पशुओं के पास कोई शब्द नहीं होते , इसीलिए उनका कोई ईश्वर भी नहीं होता क्योंकि उनके पास कोई भाषा नहीं होती |

        इसीलिये ईश्वर की कल्पना भी अलग अलग समुदायों मे अलग अलग है | खुदा , ईश्वर , गॉड , भगवान एक होते हुए भी एक नहीं है | हमारा झान जितना कम होता है , हमारा ईश्वर उतना ही बड़ा होता है | जैसे जैसे हमारी जानकारी बढ़ती जाती है , ईश्वर का दायरा संकुचित होता जाता है | ईश्वर सूक्ष्म होता जाता है , शब्द किलष्ट होने लगते हैं और झान से हम दर्शन की और प्रवेश करने लगते हैं |

        आदिम समाज मे और आज भी , आदिवासियों मे ईश्वर का क्षेत्र बहुत व्यापक है | उनका भगवान बहुत बड़ा होता है | हर बीमारी किसी न किसी देवता या देवी का साया है | लकड़ी का पुल टूट गया तो यह फलाने बाबा के रुष्ट होने का नतीजा है | आदिवासी ही क्यों , हम भी तो गाड़ी , घर , मशीन आदि सभी की पूजा करते हैं | नारियल तोड़ते हैं | अनजान का डर किसको नहीं होता |

        मनुष्य का जीवन इतनी अनिश्चितिताओं से भरा है कि हमारा काम ईश्वर के बिना नहीं चल सकता | हमे उसका सुजन करना ही पड़ता है | उसकी प्राण प्रतिष्ठा हमी करते है | फिर भव्य मंदिर , मस्जिद और चर्च बनाते हैं और अपने ही सुजन के सामने माथा टेकते हैं |

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