निर्णायक समझौता: कश्मीर और अफ़गानिस्तान दोनों समस्याओं का पूर्ण समाधान

अमेरिका और भारत दोनो एक ही देश से पीड़ित है , पाकिस्तान | समस्या भी एक ही है , पाकिस्तानी सेना द्वारा चोरी छुपे जिहादियों का पोषण , संरक्षण , प्रोत्साहन ,एवं सैन्य मदद | समस्या , हालांकि साझी है , दोनो की बेबसी से कारण अलग अलग हैं | भारत की सेनाएँ , इस काबिल तो हैं कि पाकिस्तान के जिहादी ठिकाने नष्ट कर सकें , वे संभावित युद्ध के परिणामों को नियंत्रित रखने में सक्षम नहीं है , शक्ति मे बढ़त इतनी नही है कि पाकिस्तानी सेना को स्तंभित किया जा सके | किसी भी सैन्य कारवाही से पहले , शक्ति असंतुलन इतना अधिक होना चाहिए कि पाकिस्तानी सेना लड़ने की सोचे ही नही , सीधे हथियार डाल दे | दूसरी और अमेरिकी और नाटो सेनाओं के पास ऐसी शकित है , कि यदि वे उसे पूरी तरह प्रयोग में लाएँ तो पाकिस्तानी सेना के पास कोई जवाब ही नही है , फिर भी अमेरिका कोरी धमकी देकर पाकिस्तानी सेना को समझाने बुझाने का प्रयत्न करने लगता है | कारण , वह जमीन पर अपने सैनिक नही खोना चाहता |

जमीन पर सेना भेजे बिना , नियंत्रण में दीर्घकालिक बदलाव नहीं लाया जा सकता | वायुसेना और जहाजों द्वारा आप तबाही तो मचा सकते हैं, नियंत्रण मे परिवर्तन नही ला सकते | पिछले ५० वर्षो में लगभग सभी समाजों का ढांचा बुनियादी तौर पर बदल गया है | कुछ दशकों पहले तक हर परिवार में अमूमन ४-६ बच्चे होते थे | आज यह संख्या १ या २ हो गई है | जब ४ या ६ बच्चे होते थे तब युद्ध में यदि १ या २ शहीद भी हो गए तो समाज की संरचना पर बहुत प्रभाव नहीं पड़ता था | धटना परिवार को संतप्त करती थी , लेकिन परिवार निराशा के गर्त में जा कर बदहाली का शिकार नहीं हो जाता था | आज , यदि परिवार का अकेला जवान लड़का युद्ध में मारा जाये तो यह परिवार के लिए पूर्ण विनाश का संदेश होगा | उनको जीने का उदेश्य छिनता हुआ लगेगा | किसके लिए जिएँ , यह सवाल खड़ा हो जाएगा | पूरी समाज पर इसकी गहन प्रतिक्रिया होगी | इसीलिए अमेरिका आज ड्रोन अथवा वायुसेना द्वारा हमला करने में तो नहीं हिचकिचाता , सैनिक भेजने से पहले दस बार सोचता है |

मुस्लिम देश इसमे अपवाद हैं | वहाँ आज भी छोटे परिवारों का चलन नहीं है | मुस्लिम देशों में आज भी ४-६ बच्चे वाले परिवार बहुतायत में हैं | इसी लिए जहाँ भारतीय सेना में सैनिक अफसरों के लिए लड़के नहीं मिलते , पाकिस्तान में सेना में जाने के लिए लड़को की क़तार लगी रहतीं हैं | इसी लिए आज शायद विश्व में मुस्लिम देशों में हिन्सक सधर्ष सबसे अधिक है |
भारत और अमेरिका , दोनो की , समस्या का समाधान उनके साझा समझौते में है | अमेरिका और नाटों देशों की वायुसेना और जलसेना , पाकिस्तानी सेना को पूरी तरह स्तंभित करने में समर्थ है , और भारत जमीन पर नियंत्रण करने के लिए जरुरी सैनिक दे सकता है | समझौते का उदेश्य , अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद का जड़ से खात्मा और १९४६ -४७ में ब्रिटेन द्वारा किए गए भूलों का परिमार्जन होना चाहिए |

१९४६ तक भारत के विभाजन की कोई बात नहीं थी | इससे पहले , दूसरा विश्व युद्ध जब अपनी परिणिति की ओर बढ़ रहा था और सोवियत सेनाएँ जर्मनी में प्रवेश कर चुकी थीं , इंग्लैंड के प्रधान मंत्री श्री चर्चिल ने दिल्ली स्थित भारतीय उपमहाद्वीप एवं मध्य पूर्व के सामरिक सलाहकार जनरल आर . सी . मनी को युद्ध ख़त्म होने के बाद , सोवियत संध से भारत पर होने वाले खतरों के बारे में १५ दिनों में रिपोर्ट देने को कहा | जनरल मनी ने चर्चिल को अपनी रिपोर्ट में मध्यपूर्व , ईरान और उपमहाद्वीप पर सोवियत संध के प्रभाव को रोकने के लिए भारत के उतर- पच्छिम हिस्से में ( बलोचिस्तान , सीमांत प्रांत ) ब्रिटेन और अमेरिका द्वारा सैनिक अड्डे बनाने की जरूरत बताई | भारत के तत्कालीन बाइसराय जनरल वावेल ने जब कांग्रेस के नेताओं , पंडित नेहरू और सरदार पटेल से इस बारे में राय जाननी चाही तो दोनों ने , स्वत्रंत भारत में किसी विदेशी सैनिक अड्डे की संभावना को पूरी तरह नकार दिया | वस्तुतः , इस समस्या से निबटने के लिए , कलात राज्य ( बलोचिस्तान ) को स्वतंत्र करने की योजना बनाई गई और ५ अगस्त १९४७ को भारत और पाकिस्तान की आजादी से १० दिन पहले , कलात को एक स्वतंत्र राष्ट्र धोषित कर दिया गया | जब भारत के विभाजन की बात उठी और श्री जिन्ना ने ब्रिटिश अमेरिकी सैन्य सहयोग की मंशा जताई , तब अंग्रेजो को लगा , कलात जैसे एक छोटे राज्य के बजाए पाकिस्तान से सैन्य सहयोग बेहतर होगा और उन्होंने भारत के विभाजन की प्रक्रिया को बढ़ावा दिया | यही नहीं , लन्दन के तत्कालीन भारत सचिव लार्ड लिस्तोवेले ने भारत के वाइसराय लार्ड माउन्टबेटेन को एक सन्देश भेजा की कलात को स्वतंत्र रखना बहुत जोखिम का हो सकता है अत: पाकिस्तान को ऐसा कुछ भी करने से रोका जाए , जो कलात को एक सार्वभौमिक राष्ट्र के रूप में स्वीकार करता हो | अंतत २० अप्रैल १९४८ को पाकिस्तानी सेनाओं ने अंग्रेज मेजर जनरल मैसी और ब्रिगेडियर अकबर खां के नेतृत्व में कलात पर हमला किया और रात २ बजे , कलात के शाशक नवाब रहीम यार खां द्वारा जबरन विलय के कागजों पर हस्ताक्षर करवाए गए | बलोच तभी से अपनी आजादी को लिए संधर्ष कर रहे हैं |

इस पूरे कार्यक्रम को यदि कोई देश बिगाड सकता है तो वह है , चीन | चीन, अपने पश्चिमी इलाके , सिन्कीयांग , को ग्वादर बंदरगाह से जोड़ना चाहता है | यदि चीन को आश्वस्त कर दिया जाये कि उसके असैनिक व्यापार में बाधा नहीं डाली जाएगी और उसके इस रास्ते के उपयोग का आधिकार बना रहेगा , वह भी बहुत विरोध नहीं करेगा |
भाग्यवश , अमेरिका मे आज एक ऐसा प्रशासन है , जो बड़े खतरे लेने से नहीं हिचकिचाता | उन्हें अफगानिस्तान में आज कोई रास्ता नहीं दिख रहा है | अत : वे पाकिस्तान को धमकाते भी है और फिर उसी के पास जाते भी हैं ताकि वह किसी तरह तालिबान को मेज पर लाए जिससे कि वे वहाँ से निकल सकें | हमें अमेरिका को समझाना चाहिए कि तालिबान समझौता नही चाहते | वे जमीन के लिए नहीं , विचारघारा के लिए लड़ रहे हैं | उनमे अलकायदा , आई एस , जमात – उद्दावा आदि में कोई फर्क नही है | उनका लक्ष्य अफ़गानिस्तान में नियंत्रण से खत्म नहीं होता , वह केवल पहला कदम है | उनका लक्ष्य पूरे विश्व में अमेरिका , यूरोप सहित , इस्लामिक शासन लाने से पूरा होता है | उसके लिए , वे यदि समझौता कर भी ले , तो वे उसे तोड़ेंगे | इसके लिए कितना भी संधर्ष करना पड़े , वे करेंगे | उनके लिए जिहाद में शहादत भी एक लक्ष्य है क्योंकि उसके द्वारा वह सीधे जन्नत जाते है , उन्हें क़यामत तक अल्लाह के बुलाने का इंतजार नहीं करना पड़ता | पाकिस्तानी सेना का भी लक्ष्य यही है | विश्वास नही है तो केवल पाकिस्तानी सेना का मोटो देख लें | पाकिस्तानी सेना का मोटो है , “ जिहादे सबी लिल्लाह “ यानी अल्लाह के लिए जिहाद | दोनो एक दूसरे के पूरक है |

पाकिस्तान ने १९७१ में हमें एक मौका दिया था , १९४७ में अंग्रेजों द्वारा पैदा की गई विसंगतियों को सुधारने का | तात्कालीन राजनैतिक नेतृत्व ने इसे आधा ही किया | सेना द्वारा खोले गए संभावनाओं का पूरा फायदा नहीं उठाया गया और जो थोड़ी बहुत बढ़त मिली भी थी , उसे शिमला समझौता में खो दिया गया | आज हमारे राजनैतिक नेतृत्व को एक बार फिर मौका मिला है , इतिहासिक भूलों को सुधारने का | हमारा लक्ष्य पूरे जम्मू कश्मीर की पाकिस्तानी अतिक्रमण से मुक्ति , बलोचिस्तान खैबर पख्तुनवा एवं सिंध मे जनमत संग्रह द्वारा उनके भविष्य का निर्णय , इस प्रकार पाकिस्तान का पुनर्गठन और पाकिस्तानी सेना की काट छांट होना चाहिए | पुनर्गठित पाकिस्तान की सीमाओं की गारंटी यदि अमेरिका , यूरोप , भारत , चीन , रूस , ईरान समेत सभी देश दे दें तो उसका दायरा केवल आंतरिक शांति बनाये रखने का हो जाता है , उसी के अनुसार उसे पुनर्गठित करना चाहिए | सवाल यह है कि क्या आज के भारतीय नेतृत्व के पास इतना साहस और दूरदृष्टी है कि वह इस निर्णायक समझौते की पहल कर सके

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